Monday, July 5, 2010

रेहड़ी वाला

   उस  दिन भी बहुँत सर्दी थी  वो अभी बाज़ार मै आ कर खड़ा ही हुआ था फठे होठ बिखरे बाल पतला दुबले  शरीर मै से हडिया ऐसे चमक रही थी जैसे सूखे पेड पर टहनिय  कपडे भी जगह जगह  से फठे थे जो उसे सर्दी मै कप्कपने के लिए मजबूर कर रहे थे पर वो था की सर्दी की परवाह  ना करते हुआ  जोर जोर से गला फाड़  कर चिल्लाने लगा प्याज़ ले प्याज़ जिस दुकान के आगे वो खड़ा था उस दुकान का मालिक ये  सुन कर झल्ला गया और जोर से उस पर चिल्लाया अबे क्यों इतना जोर से आवाज लगा रहा है आराम से खड़ा हो  जा नहीं तो दुकान के आगे से हटा दुगा सहम गया था वो बेचारा पर कह कुछ ना सका बस येही बुद बुता रह गया अच्छा  बाबु  जी  और वो ग़ुम सुम सा     ना जाने  क्या सोचने लगा  की इस से  तो गावं मै  ही सही था कम से कम जो भी रुखी सुखी  मिल रही थी कम से कम बच्चो के साथ तो था उसने लोगो से सुन रखा था की इधर बड़े लोग रहते है  शायद कुछ अच्छा बिक जाये पर यहाँ आते ही तो इस का वास्ता इन से पड़ा  जो इन को अपनी दुकान के आगे से ही हटाने की बात कह रहा है इस से अच्छा तो मै वही गाँव  मै ही था पूरी  के चक्कर मै मैंने आधी भी गवा दी बच्चोकी याद भी दिन रात सत्ताती है और वो अपने आप ही बुद बुदाने लगा तभी उस के बुद  बुधा हट  को सिपाही की आवाज ने तोडा अबे किस से पुछ कर लगाई है यहाँ रहेडी जनता नहीं है की यहाँ खड़े होने के पैसे लगते है तुझे किसी ने बताया नहीं     नहीं बाबु जी मुझे नहीं पता था अभी अभी आया हु थोड़ी सी देर में चला जाउगा अबे जाता है या  मरू तेरी..........एक  डंडा  चल निकल गली से नहीं तो फैक दूंगा तेरा ताम तोबड़ा सुन कर रहेडी  वाला  सहम गया और इतना ही बोल  पाया की अच्छा बाबु जी जाता हु और वो अपने आप मै बस येही सोचता हुआ वहा से चल पड़ा की हे  भगवन ये क्या तेरे ही बन्दे है    जो अपने थोड़े से सवार्थ के लिए किसी की मजबूरी को भी नहीं समझते रोक लो इन्हें कही ऐसा ना हो की  किसी रोज़ ये तुम से भी मंदिर मै रहने  के लिए .........................                                              ललित भसोड़               9313052941

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