Thursday, July 8, 2010
सर्दी आज भी अपने चरम पर थी और वो चारो बच्चे घर पर अकेले थे १ कल रात भी उनहोने ठीक से खाना ठीक से नहीं खाया था भूके होने के कारन से वो चारो ही कुछ जयादा थके हुए थे चारो बच्चे एक दुसरे को ऐसे देख रहे थे मानो वो एक से कह रहे हो की कुछ तो करो अब और भूखा रहा नहीं जाता है उन सब मै से उनका सब से बड़ा भाई अपने आप को सब से जयादा परेशान मह सुस कर रहा था उसके मन चल रहा था की वो सब से बड़ा होते हुए भी कुछ नहीं कर पा रहा है की तभी जोर से बिजली कडकी और कुछ ही देर मे अन्धीरा होने लगा ठंडी ठंडी हवा चलने लगी सर्दी से अब तो कप कपि लगने लगी ऐसे मे कुछ गरम चाय कही से मिल जाती तो सायद बात बन जाय पर चाय आये कंहा से कुछ नहीं सु झ रहा था की तभी उनहे यद् आया के घर के मंदिर मे एक गल्ला भगवन के नाम पर रखा रहा था जिस मे उन की माँ कभी कभी कुछ पैसे डालती थी फिर क्या था बच्चो ने हिम्मत कर के वो गल्ला सब से छोटी बहन के मन करने के बाद भी फोड़ दिया वो कहती ही रह गयी की वो जब शाम को माँ घर आये गी तो वो सब बता देगी पर किसे ने उसकी एक ना सुनी और भगवन का गल्ला फुट गया पर यह क्या गल्ला फूटा भी तो उस मे से बस इतना ही पैसा निकला की दूध और चाय पती ही आ पाती खैर उस वक़्त यह ही फैसला लिया गया की दूध और पती तो लाई जाये घर मे जलाने का इंधन भी नहीं था सो उसका यह हल निकला गया की बाज़ार से रद्दी कागज लकड़ी जो भी मिले उसे चुन कर लाया जाये और ............और उन बच्चो ने चाय इस तरह से बना कर पी ली कुछ तो रहत मिली थी पर छोटी ने फिर से कह दिया की वो माँ को सब बता देगी की गल्ला उसने नहीं फोड़ा था सब भी उसे भी मन्ना ही रहे थे की तभी उनका पिता आज दिन मे ही शराब पी कर आ गया घर मे आते चारो बच्चे बाहर आ गए बरसात जो अभी तक धी रे धी रे हो रही थी वो अब बहुँत जोर जोर से होने लगी थी ...बच्चे अब और भी जयादा परेशान हो गए थे की अब वो दोपहर मे क्या खायगे और बाहर बरसात और तेज हो गयी थी बच्चो को अब सर्दी भी नहीं लग रही थी वो अब बस चुप चाप बैठे थे
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